बुधवार, 24 अगस्त 2011

Child laborers – The Cheap Commodity of India



 
Child Labor
Child laborers – The Cheap Commodity of India
Shiva, an eight-year old orphan was reported dead on June 29, 1993, after he was caught escaping and then beaten and scorched to death by his employer.
In another incident, 446 children were rescued from over 200 zari shops in the glamorous city of Mumbai, while 25 children were rescued from an ill-lit small room converted into a zari factory in the national capital, New Delhi.
The 1991 Census carried out by Government of India states that there are 11.28 million working children under the age of fourteen years in India. Advocacy groups suggest the real figure could be as high as 60 million.
With figures from varied sources giving verdict, India is known to have the largest number of working children in the world. A research carried out by Save the Children, shows that 74 percent of child domestic workers in India are between the ages of 12 and 16, most of them working at measly wages.
          Toiling in the heat of stone quarries, working in the fields for long hours, picking rags in city streets or stashed away as domestic servants, these children are sentenced to a life of misery, suffering and horrors.
In most of the Indian industries, girls are recognized as unrecognized laborers because they are seen as Help & Supporters and not workers. Hence, this section remains almost totally unprotected by law.
 
The Background
Welfare organizations define a child laborer as a child who has to work everyday, sometimes for more than 14 hours a day and is not paid as per norms.
          The International Labor Office reports that children work the longest hours and are the worst paid of all laborers.

The Child Labor Act of India prohibits employment of children less than 14 years of age in 13 occupations and 57 processes. The law also lays down penalties for employment of children in violation of the provisions of this Act and regulates the employment of children with respect to working hours, number of holidays, health and safety in workplace.

Nevertheless, the menace continues to grow unbridled. No doubt, the industries and the families of such children share the blame, but the onus lies first on the lawmakers and watch-guards of our society and nation.
Child labor presents itself in a series of forms of labor involving children. These include:
  • Domestic servants
  • Forced and bonded labor
  • Commercial sexual exploitation
  • Industrial and plantation work
  • Street work
  • House hold work
Experts point out towards the following as being the root cause of the rampant child labor scenario in India:
  • Poverty
  • Family debt
  • Administrative attitude
  • Easier and cheaper availability of child laborers
  • Social mindset
In a prominent uproar, the National Human Rights Commission also (NHRC) issued notices to the Delhi government over reports of continuing instances of child labor in the Capital despite the ban.
 
 

रविवार, 12 जून 2011

कोई बाल श्रमिक नहीं रहे, प्रतिभा का दबकर रहना पाप: गहलोत

जयपुर. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि राज्य में कोई भी बाल श्रमिक नहीं रहे और सभी बच्चे शिक्षा से जुड़ें यह हमारा संकल्प होना चाहिए। प्रतिभा का दबकर रह जाना किसी पाप से कम नहीं है। मुख्यमंत्री निवास पर अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस पर ‘नन्हें हाथ कलम के साथ, बाल श्रम से शिक्षा की ओर’ अभियान के दूसरे चरण में रैली को रवाना करने से पूर्व बाल मित्रों एवं अन्य बच्चों से गहलोत ने यह बात कही।

उन्होंने बाल श्रम उन्मूलन के लिए सतत प्रयत्नशील रहने की शपथ वाले बैनर पर भी हस्ताक्षर किए एवं रैली को हरी झंडी दिखाकर अभियान की शुरुआत की। कार्यक्रम में डूंगरपुर एवं उदयपुर जिलों तथा जयपुर शहर के आस पास के स्कूलों के 210 बच्चे मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि बाल श्रमिकों में भी प्रतिभा छिपी होती है। उसे आगे लाना और शिक्षा से जोड़ना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। मुख्यमंत्री ने पालड़ी मीणा बस्ती में खोले गए प्राथमिक स्कूल को उच्च प्राथमिक में क्रमोन्नत करने की घोषणा करते हुए कहा कि उसे आदर्श बस्ती के रूप में विकसित करने का सरकार पूरा प्रयास करेगी।

बालमित्र जोड़ेंगे बच्चों को: बाल श्रम से शिक्षा की ओर अभियान के दूसरे चरण के तहत 24 बाल मित्र दो अलग-अलग कारवां के साथ उदयपुर जिले के झाड़ोल एवं कोटड़ा क्षेत्र के 179 गांवों में जाएंगे एवं बालश्रम से जुड़े बच्चों को शिक्षा से जोड़ने, बालश्रम के दुष्प्रभाव के प्रति लोगों को जागरूक करने, बालश्रम के लिए बच्चों का अन्य राज्यों में पलायन रोकने तथा सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देने का कार्य करेंगे।

 

मौत के आंगन में खेल रहे 21.5 लाख बाल श्रमिक'


मौत के आंगन में खेल रहे 21.5 लाख बाल श्रमिक'

 
Source: Agency   |   Last Updated 10:59(12/06/11)
 
 
 
 
 
संयुक्त राष्ट्र. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का कहना है कि विश्वभर में करीब 21.5 लाख बाल श्रमिक जोखिम भरे काम कर रहे हैं जिससे उनके घायल होने, बीमार पड़ने और मरने तक का खतरा है। अपनी एक नई रिपोर्ट ‘जोखिम भरे कामों में बच्चे, हम क्या जानते हैं, हमें क्या करने की जरूरत है’ में संगठन ने औद्योगिक और विकासशील देशों के शहरों में हुए अध्ययन का हवाला दिया है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक हरेक मिनट एक बाल श्रमिक काम से जुड़ी दुर्घटनाओं, बीमारी या मानसिक सदमा झेलता है। बालश्रम के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की तैयारी कर रहे संगठन की कल जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि वर्ष 2004 और 2008 के बीच जोखिम भरे कामों में लिप्त पांच से 17 साल की उम्र के बच्चों की संख्या में गिरावट आई है लेकिन इस अवधि के दौरान 15 से 17 साल के बाल श्रमिकों की संख्या में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो पांच करोड़ 20 लाख से बढ़कर अब छह करोड़ बीस लाख हो गई है।

आईएलओ के महानिदेशक जुआन सोमाविआ ने कहा, ‘पिछले दशक में हालांकि महत्वपूर्ण प्रगति हुई है लेकिन इसके बावजूद विश्वभर में बड़ी संख्या में बाल श्रमिक विशेषकर जोखिमभरे कामों में बाल श्रमिक अभी भी बहुत ज्यादा हैं।’

शुक्रवार, 20 मई 2011

फिर खुलेंगे 33 बाल श्रमिक विद्यालय


फिर खुलेंगे 33 बाल श्रमिक विद्यालय

भागलपुर : नेशनल चाइल्ड लेबर प्रोजेक्ट (एनसीएलपी) के तहत कराये गये इस सर्वे के बाद 33 बाल श्रमिक विशेष विद्यालय पुन खोले जायेंगे. स्थानीय प्रशासन द्वारा इसका प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेज दिया गया है.
जिले में ताजा सर्वे के मुताबिक 1802 बाल श्रमिक हैं. इन विद्यालयों की कार्य अवधि तीन साल की होती है.
इसके पूर्व भी जिले में 92 बाल श्रमिक विशेष विद्यालय संचालित थे, जिनमें 75 का तीन साल की अवधि 30 नवंबर को पूरी हो गयी थी. अन्य 17 विद्यालय भी 31 मई को बंद हो जायेंगे.इस बाबत एनसीएलपी के प्रभारी संजय कुमार ने बताया कि जिले में जिला पदाधिकारी बाल श्रमिक विशेष विद्यालय के चेयरमैन होते हैं जबकि एनजीओ व ट्रेड यूनियन से जुड़े लोगों के साथ ही श्रम, शिक्षा तथा इससे जुड़े अन्य विभागों के वरीय पदाधिकारी इसके सदस्य होते हैं. केंद्र से मंजूरी मिलने के बाद चेयरमैन व सदस्यों की आपसी सहमति से विद्यालय खोलने की प्रक्रिया शु कर दी जायेगी. एक विद्यालय तीन वर्ष के लिये खोला जाता है.
क्या है बाल श्रमिक विद्यालय
ईंट-भट्ठों सहित अन्य औद्योगिक इकाइयों या अन्य खतरनाक उपक्रम में कार्य करने वाले 9 से 14 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा के लिये यह स्कूल खोला जाता है. स्कूल में बच्चों को तीन साल तक शिक्षा देने के बाद मुख्यधारा से जोड़ते हुए छठी कक्षा में उनका सामान्य स्कूल में नामांकन करा दिया जाता है. स्कूल में शिक्षा के अलावा उम्र व कार्य अनुभव को देखते हुए बच्चों को वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जाती है.
पोषाहार व छात्रवृत्ति
विशेष विद्यालय में नामांकित बच्चों को सरकार की ओर से पूरक पोषाहार दिया जाता है. पांच रुपये प्रति बच्चे, प्रति दिन के हिसाब से पोषाहार राशि का वितरण किया जाता है. इसके अलावा सभी बच्चों को 100 रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति भी मिलती है. यह छात्रवृत्ति बच्चों के मुख्यधारा से जुड़ने के बाद दी जाती है. तब तक यह राशि छात्र के नाम खोले गये बैंक अकाउंट में जमा रहती है.
एक विद्यालय पर खर्च
एक बाल श्रमिक विशेष विद्यालय में कम से कम 46 विद्यार्थी होने चाहिए. इसके लिये दो शिक्षक, एक वोकेशनल प्रशिक्षक, एक क्लर्क या एकांउटेंट तथा एक सहायक या चपरासी होते हैं. इन पर मासिक भुगतान के अलावा पठन-पाठन सामग्री, किराया, बिजली बिल, पानी ओद मिला कर साल में प्रति विद्यालय लगभग सवा दो लाख रुपये का खर्च आता है. स्कूल शिक्षक 36,000 वोकेशनल प्रशिक्षक 18,000 क्लर्क-अकाउंटेंट 16,800सहायक-चपरासी 9,600छात्रवृत्ति 60,000 पोषाहार , 71,760 सामग्री, 10,000किराया, बिजली, पानी 12,000 अन्य 4,000 कुल, 2,38,160
लगते रहे हैं प्रश्नचि
जिले में संचालित 92 बाल श्रमिक विशेष विद्यालयों पर प्रश्नचि लगते रहे हैं. पिछले दिनों कल्याण विभाग के उपनिदेशक ने जब इन विद्यालयों की जांच की थी तो करीब 70 फीसदी विद्यालय बंद पाये गये थे. जो खुले थे उनमें भी मानक के अनुप न तो विद्यार्थी थे और न ही शिक्षक. 5-10 विद्यार्थियों को लेकर महज दिखावा के लिये कुछ विद्यालय चलाये जा रहे थे, जबकि रजिस्टर पर इससे कहीं ज्यादा की उपस्थिति दर्ज थी.पोषाहार व शिक्षकों को मानदेय ओद का भुगतान भी नियमित नहीं था.
- संजय निधि -

मंगलवार, 17 मई 2011

विज्ञानं  और तकनीक ने मनोरंजन जगत पर पूरी तरह से कब्ज़ा कर लिया है. aaipoud  , मोबाईल. मल्टीप्लेक्स और न जाने क्या क्या? अब तो हम ये सोचने की ज़हमत भी नहीं उठाया की आखिर पीछे क्या छूट गया है? जैसे ये सनीमा ...

बाल श्रम : डाo एo कीर्तिवर्धन


मैं खुद प्यासा रहता हूँ पर
जन-जन कि प्यास बुझाता हूँ
बालश्रम का मतलब क्या है
समझ नहीं मैं पाता हूँ

भूखी अम्मा, भूखी दादी
भूखा मैं भी रहता हूँ
पानी बेचूं,प्यास बुझाऊं
शाम को रोटी खाता हूँ

उनसे तो मैं ही अच्छा हूँ
जो भिक्षा माँगा करते हैं
नहीं गया विद्यालय तो क्या
मेहनत कि रोटी खाता हूँ

पढ़ लिख कर बन जाऊं नेता
झूठे वादे दे लूँ धोखा
अच्छा इससे अनपढ़ रहना
मानव बनना होगा चोखा

मानवता कि राह चलूँगा
खुशियों के दीप जलाऊंगा
प्यासा खुद रह जाऊँगा,पर
जन जन कि प्यास बुझाऊंगा

--
डाo एo कीर्तिवर्धन
09911323732
http://kirtivardhan.blogspot.com/

शुक्रवार, 18 मार्च 2011